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22वाॅं श्रावक संस्कार षिविर गुना (मध्यप्रदेष)

परम पूज्य आध्यात्मिक आचार्य षिरोमणी महाकवि 108 श्री विद्यासागरजी महाराज के अप्रीतम, अज्ञानुवर्ती, परम सुयोग्यतम, तीर्थोंद्धारक, वास्तुविज्ञ परम षिष्य परमपूज्य मुनिपंुगव 108 श्री सुधासागरजी महामुनिराज के ससंघ क्षुल्लक श्री गंभीरसागर जी, क्षुल्लक श्री धैर्यसागरजी महाराज की पावन प्रेरणा से छांव तले वर्षायोग 2013 के पर्वाधिराज दषलक्षण के पावन प्रसंग पर दिनंाक 09/09/2013 से 18/09/2013 तक विषाल स्तर पर सकल दिगंबर जैन समाज गुना के अदम्य उत्साह एवं चिरकाल प्रतिक्षित भावनाओं को समेटे हुए ’नगर के लब्ध प्रतिष्ठित उदारमना, दानवी, देव, शास्त्र, गुरू भक्त श्रेष्ठि श्री राजेन्द्र कुमारजी, मनोज कुमारजी, सौरभ कुमारजी, मयंक कुमारजी धरनावदा वालों के पुण्यार्जकत्व में ’’श्रावक संस्कार षिविर’’ समायोजित किया गया ।

सर्वप्रथम उल्लेखनीय है कि श्रावक संस्कार षिविर की महत्वता जीवन में सारभूत उपयोग एवं पूर्ण धार्मिक, आध्यात्मिक विचारों से ओत प्रोत को अनुभव किया युवारत्न श्री मयंक कुमारजी ने यथार्थ में इन्होंने सात षिविरों में भाग लेकर समाज में इसकी रचनात्मक उपयोगिता को समझा था । भावना भव के कार्यों में बड़ी बलवती होती है । धरनावदा वाले धर्मनिष्ठ परिवार ने मुनिश्री के पावन चरणों में अत्यन्त मनोभाव से श्रीफल समर्पित कर ’’श्रावक संस्कार षिविर’’ के पुण्यार्जक बनने का आषीर्वाद प्राप्त कर सकल दिगम्बर जैन समाज से समर्थन प्राप्त कर धन्य हो गये । श्री मयंकजी के हर्ष का पारावार नहीं था ।

उल्लेखनीय है कि करूणा, दया, क्षमा एवं शान्ति के भंडार अग्रदूत संत प्रतिदिन अपने मार्मिक प्रवचनों भव्यात्माओं, जिज्ञासुओं की प्यास ही नहीं बुझाते है अपितु गुरूकुल पद्धति से व्यक्ति को सुसंस्कारित कर वास्तविक जीवन जीने की एक अद्भुत कला सिखाते हैं, अद्वितीय है, अनुकरणीय है, आदर्ष है । यही कारण है कि जिन संत चरित्रों की रज पाकर सतत् स्पर्ष कर भारतीय वसुन्धरा धन्य हुई मुनिश्री का श्रमण समाज में नाम अग्रगणनीय है ।

श्रावक संस्कार षिविर के प्रथम उपदेष्ठता मुनिश्री ही है, सर्व प्रथम इसका शुभारंभ किया जैन नगरी, संस्कारधानी ललितपुर से 1993 में, समाज ने अहसास किया कि संस्कार विहीन व्यक्तियों के लिये धार्मिक विचारों, कार्यक्रमों की महती आवष्यकता है, प्रातः से रात्रि तक श्रावक व्यस्त रहना चाहिये । प्रयास एवं लग्न में समाज सफलीभूत हुआ ।

सन् 1994 में इन महा ऋषिराज ने क्षुल्लक द्वय के साथ राजस्थान में प्रवेष किया । उन्हीं के प्रभामंडल से तत्काल प्रभावित होकर सर्वप्रथम छोटे से रूप में बीजारोपण किया अतिषय क्षेत्र श्री पद्मप्रभुजी में । पद्मप्रभुजी से सांगानेर, सांगारेर से बिहार करके गुरूवर का मंगल प्रवेष हुआ अजमेर (राजस्थान) में । विष्व विख्यात सोनीजी की नसियाजी में परमपूज्य जगत् पूज्य गुरूवर मुनिश्री एवं क्षुल्लक द्वय का ऐतिहासिक चातुर्मास स्थापित हुआ ।

यद्यपि मुनिश्री के पावन सानिध्य में 2 षिविर आयोजित हो चुके थे । विधिवत विषाल स्तर पर युवकों में एक चेतना लिये पूर्व नियोजित कार्यक्रमानुसार दषलक्षण पर्व के पावन प्रसंग पर अजमेर सोनीजी की नसियाजी आयोजित किया गया । उल्लेखनीय हे कि इस षिविर में देषभर से लगभग 900 षिविरार्थियों ने भाग लिया अभूतपूर्व अनेक सामाजिक, धार्मिक उपलब्धियों के साथ सुसंपन्न हुआ । परिणामत इस षिविर ने एक आदर्ष छाप छोड़ दी और 1995 से अब तक 2013 तक देष के विभिन्न नगरों में एक से एक अपनी अपनी बढ़ोत्तरी लिये उन स्थानों पर कीर्तिमान स्थापित करते हुये परम पूज्य मुनिश्री का चातुर्मास अन्तराल में श्रावक संस्कार षिविर एक पर्यायवाची सा बन गया है ।

यथार्थ में षिविरों में भाग लेकर गये हजारो-हजारों व्यक्तियों ने अपना जीवन धन्य किया । व्यसन मुक्त हुये, श्रावक के षट्आवष्यक दैनिक कार्य क्रमों को अपने जीवन में ग्रहण किया । मात्र 10 दिन गुरूवर इस प्रकार व्यक्ति को अपने आचरण से व्यक्तित्व से आभा से तप एवं संयम से इस प्रकार आच्छादित कर दते हैं, व्यक्ति सोचकर जाता है कि अब तक का जीवन बिना नियम, संयम के यूंही प्रमाद में ही गमाया ।
जहां-जहां पर गुरूवर श्री सुधासागरजी महाराज के वर्षायोग हुए, गुरू आज्ञा से ही हुए हैं । उन स्थानों पर सामाजिक, समन्वय करते हुए जो भी आयतन, जीर्णोद्धार, नव निर्मित मंदिर तीर्थ स्थापना आदि रचनात्मक कार्य हुए प्रषंसनीय है उल्लेखनीय हैं ।

यद्यपि चूंकि श्रावक संस्कार षिविर का एक ही निर्धारित कार्यक्रम सुनिष्चित हो चुका था, अतएव प्रत्येक स्थान पर उसी परम्परा का अनुसरण किया जाता रहा है । प्रातः 3ः50 बजे से रात्रि 10 बजे तक के दैनिक कार्यक्रम सर्वत्र एक समान हैं । शुद्ध भोजन व्यवस्था, आवास व्यवस्था, रिजिस्टेषन व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, प्रचार प्रसार व्यवस्था, विद्युत एवं पाण्डाल, पूजन सामग्री व्यवस्था, अल्पाहार जलपान व्यवस्था, यातायात व्यवस्था, जुलूस व्यवस्था, धोती-दुपट्टा व्यवस्था, प्रषिक्षण हेतु स्थान व षिक्षक व्यवस्था, वीडियो ओडियो, स्वंय सेवा व्यवस्था, षिविरार्थियों को प्रमाणपत्र आदि । परीक्षा व्यवस्था, षिविरार्थियों के लिये श्रावकों के घर पर ही संख्यानुसार भोजन व्यवस्था ।

इस प्रकार इस महान अभियान में उपरोक्त सभी व्यवस्थाओं में इस वर्ष इस बार जो व्यवस्थायें, सेवाएं प्रदान की निष्चित ही आषातीत हैं । मुझे यह भी ज्ञात है वर्षायोग समिति 2013 के चयनित व्यक्तियों ने एक माह पूर्व ही प्रतिदिन मीटिंग कर करके इस अनुष्ठान में अपना पूर्ण समय समर्पित करके निष्चित ही कीर्तिमान स्थापित किया है । वर्षायोग में एवं विषेष तौर से परमपूज्य गुरूवर के प्रवचनों ने सम्पूर्ण नगर में जो जागृति उत्पन्न की है, वर्णातीत है । अनेक जैनेतरों ने मुनिश्री के मात्र प्रवचन सुनकर अपना जीवन परिवर्तन किया है, अनुकरणीय है, आदर्ष है ।

22वाॅं श्रावक संस्कार षिविर ने गुना नगर में जो धार्मिक वातावरण आच्छादित किया है, अवर्णनीय है । श्रावकों ने इस महान अभियान में जो योगदान दिया है, सेवाएं दी हैं, मात्र यह समझकर ऐंसा अभूतपूर्व स्वर्णासर कभी नहीं मिलने का । ’’गुरू की महिमा वरणी न जाये, गुरू नाम जपो मन वचन काय’’ अंत में केवल इतना ही कह सकता हूॅं इस षिविर ने सभी रिकाॅर्ड तोड़ दिये निष्चित ही यह एक रिकाॅर्ड है । 22वें षिविर में 2200 षिविरार्थी कीर्तिमान है ।